Creative · Prose8/2/2026
🌌 कोख से शून्यता तक: चेतना का 'System Crash' 🧠⚡
by Anil Sharma
"एक उमस भरी रात, दादा के दहेज का खड़खड़ाता पंखा, और अचानक शून्यता का अहसास... समाज के गढ़े हुए दकियानूसी चोगों को उतारकर, अस्तित्व की आज़ादी को महसूस करने की एक वैचारिक यात्रा....
पृथ्वी ने काली अचकन ओढ़ रखी थी, उसी के भीतर लिपटे हम, एक-दो-चार तारों को निहार रहे थे। दिन भर की प्रेशर-कुकर वाली गर्मी, शरीर पसीने से लथपथ हो जाए और अब रात की छुक-छुक करके चलने वाली हवा की फुहार और तेज हो जाती है जब सामने विराजमान दादा के दहेज के पंखे की खड़ -खड़ाती ताड़ियों से होकर सर-सराते हुए हवा निकलती है... पंखा भी मानो जवान हो उठा है...!
उसी सर-सराती हवा में बहता हुआ ख्याल, मेरे मन के धरातल पर विचरण करने लगा कि, काश मैं भी हवा में तैरने लगू, लेकिन झट से याद आया मुझे तो तैरना ही नहीं आता, मैं तो डूब जाऊँगा, अपने ही विचारों की आँधी में। क्या होगा डूबने के बाद? क्या "मैं" बचेगा या वो भी उसी क्षण ओझल हो जाएगा? ... तो फिर क्या बचेगा? ...!
जैसे-जैसे यहाँ की हवा मंद होने लगी, मेरे यह विचार भी ठहरने लगे, सवाल पर सवाल पुछे जा रहे हैं, अंत में क्या बचेगा? ... क्या? ... !! सवालो के इतने थपेड़ो ने कानो को सुन्न कर दिया, और अगले पल अहसास हुआ कि शायद मुझे अंत में ,अपने अंत का भी अहसास नहीं होगा। यही सबसे क्रूर एवं अकाट्य सच है, जैसे हमे अपनी माँ की कोख में आने का अहसास नहीं हुआ था वैसे ही इस धरती माँ की कोख से जाने का भी अहसास नहीं होगा कि हम जा चुके है या नहीं। एक पल के लिए यह सुक्ष्म सा विचार शायद हर किसी को विचलित एवं संकुचित कर दे।
मृत्यु का मतलब, श्रीमद् भगवदगीता में उल्लेखित वस्त्र बदलने वाली कोई अनोखी वस्तु नहीं है बल्कि सबसे डरावना पल है, जहाँ केवल आपका भौतिक शरीर नहीं मरता बल्कि आपका "मैं" ही इस ब्रह्मांड की शून्यता में कही खो जाता है।
हमे अभी अपने होने का जो अहसास है वह केवल जन्म से आज तक ज्ञानेन्द्रियों से सीखी हुई जानकारी से उत्पन्न विचारो का पुलिंदा मात्र है। समय के साथ यह पुलिंदा बढ़ता जाता है और हमारे "मैं" को बल मिलता जाता है। यह "मैं" कोई अदृश्य या अलौकिक शक्ति नहीं बल्कि विचारों के पुलिंदे में उत्पन्न चेतना का प्रतीक सूचक है, इन सब का आधार हमारे कानो के मध्य स्थित तंतुओ के जाल (मस्तिष्क में) हैं, जहाँ हर क्षण चल रहे हलचले (activities) एवं ऊर्जा का प्रवाह ही जीवित होने का अहसास है।
मृत्यु के समय सबसे पहले यही हलचले थम जाती, मस्तिष्क का पूरा System Crash हो जाएगा और उसी के साथ हमारे होने या ना होने का अहसास भी। हमे यह भी मालूम नहीं होगा कि हम मर चुके है, हमारा "मैं" भी शून्यता में मिल जाएगा और इस शून्यता के आगे कुछ नहीं।
अंततः मृत्यु का सच यही है कि आपका भौतिक शरीर मिटना आपका अंत नहीं है बल्कि इतने सालो से संजोयी हुई विचारो की धरोहर के साथ आपके "मैं" का अंत होना है।
धर्मो के साम्राज्यो द्वारा गढ़ी हुई, आत्मा, पारलौकिकता बस मनुष्य एवं समाज को मौत के उस भयानक सच से अनभिज्ञ रखना मात्र है, ताकि उनकी गढ़ी हुई परिपाटी एवं सिद्धांतो का हम हिस्सा बनकर रहे। और वही परिपाटिया आज कर्मकांड, आडंबरो का संसार बन गई है जहाँ मनुष्य उसी संकीर्णता एवं दकियानूसी विचारो में खुद को जकडे रखता है, कभी स्वयं का स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित कर ही नहीं पाता। क्योंकि हर चौराहे पर अशुभ-शुभ के मंत्र झाड-फूंककर उसमे भय पैदा किया जाता है और उसी से ऊपर उठते-उठते उसका जीवन उठ जाता है और उस अंत में शून्यता के अलावा कुछ हाथ नहीं आता है।
जीवन को अमूल्य और एक ही बार मिलने वाली धरोहर समझो, खुलकर जिओ, सभी दकियानूसी एवं अतार्किक विचारो के अचकन (चोगे) को उतार फेंको, हर पल आपका कीमती है उसी को आखिरी पल समझकर पूरे आनंद और स्वच्छंदता के साथ जिओ।
अब भय बचा किसका? क्योंकि आप न तो जन्म से पूर्व कुछ थे न ही मौत के बाद कुछ बचेंगे। बस यह मध्य का छोटा सा समय ही आपका है! समाज एवं लोगो द्वारा गढ़ा हुआ - तृष्णा, लोभ, युद्ध, झगड़े, लंपट सब के सब यहीं रह जाएंगे, उनसे व्यथित होकर अपना समय मत गवाओ।
आपके जीवन के अंतिम पलो में शायद आपके विचार अथवा आपका "मैं" न रहे लेकिन आप रह सकते है अपने अच्छे कर्मो से। अपने सुखो के साथ-साथ अपना वक्त समाज के लिए, वंचितो के लिए, राष्ट्र के लिए, पूरी मानवता के उत्थान में लगाओ, ताकि जब अंत आए तब आपका 'मैं' का अंत हो, आपका नहीं। आप सदैव अमर रहे - कर्तव्यो, कर्मो एवं कल्याण की भावना के कारण।
इन सब के साथ आपके विचार सबसे मूल्यवान पूंजी है, जीवन भर विचारो के मतभेद के कारण दूसरो से उलझने से बेहतर है अपने विचारो को आकार देने एवं सुलझाने का प्रयत्न करे। और इसी दिशा में अग्रसर **Spandan Nexus** आपका साथी बनेगा जो आपके विचारो को आकार के साथ, वैश्विक मंच पर पहचान भी देगा,यहाँ संचित आपके विचारो की पूंजी सदैव जीवित रहेगी l
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