Creative · Prose10/27/2026

​🧠 ख्यालों का कुकर vs इच्छाशक्ति 🔥

by Anil Sharma

​मैं हमेशा की तरह आज भी अपनी लाइब्रेरी की टेबल पर बैठा था। दीवार पर टंगी घड़ी में पौने ग्यारह बज रहे थे। मेरी बायीं तरफ बैठा सज्जन लक्ष्मीकांत के पन्नों को टटोल रहा था, तो दायीं ओर वाला संस्कृत के पठ् धातु—पठति, पठतः, पठन्ति !! यूँ ही इधर-उधर झांकने के बाद थोड़ी-थोड़ी इच्छा मुझे भी हुई कि मैं भी थोड़े पन्ने पलट लूँ; झट से पुस्तक खोली और Reading start...! ​उसी दौरान मेरे मन में एक विचार आया कि असल में यह 'इच्छा' है कौन? और क्यों आती है? इसमें ऐसी कौन-सी शक्ति है कि व्यक्ति को कार्य करने के लिए मजबूर कर ही देती है, जबकि कभी-कभार जब मैं किसी वस्तु या काम का ख्याल/विचार करता हूँ तो उसी वक्त वो शक्ति महसूस नहीं होती—केवल ख्याल पर ख्याल, और अंत में बन जाता है विचारों या ख्यालों का पुलाव !! ​इन दोनों में विभेद किधर है? दोनों उत्पन्न तो मन के धरातल पर ही होते हैं—एक सक्रिय शक्ति बनकर कार्य को पूर्ण करने की ओर अग्रसर होता है, जबकि दूसरा निष्क्रियता में सिमट कर रह जाता है, ख्यालों के इस मस्तिष्क रूपी बड़े कुकर में। ​अगर ध्यान से इन दोनों को बारीकी से देखा और समझा जाए, तो इच्छा जब बलवती और शक्तिशाली हो जाती है तभी बनती है इच्छाशक्ति (Willpower)—यह Intuition (अन्तर्मन) है, कार्य (Goal) को पूर्ण करने की दृढ़ भावना। यह हमारे भीतर जितनी अधिक विकसित होगी, हमारे लक्ष्य, संकल्प व इच्छाएँ उतनी ही जल्दी पूर्ण होने की संभावना बढ़ेगी, क्योंकि इससे निरंतरता, धैर्य एवं अनुशासन विकसित होगा। ​जबकि ख्याली दुनिया में विचरण करने वाले विचारों को निरंतर सोचते ही रहते हैं, Action नहीं लेते। उन्हें बड़ा तो बनना है, बस अपने विचारों में ही! यही तो है "ख्याली पुलाव"! वैसे तो दोनों मन में ही उत्पन्न होते हैं, किंतु फर्क बस उन्हीं विचारों को इच्छाशक्ति द्वारा Action में बदलने व दूसरी ओर निष्क्रिय होकर बस ख्यालों में जीना है l ​हाथ में आम का बीज रखकर हम बस ख्याल करते रहेंगे कि यह बड़ा होकर सुंदर वृक्ष बनेगा, हरे-पीले आम होंगे—तो फिर ख्यालों में बैठकर आम गिनते रहो! क्योंकि अगर सच में आम खाना है तो भूमि में बीज बोना होगा, उसे निरंतर धूप, खाद व पानी देना होगा, संघर्ष व मेहनत से सींचित करना होगा—यही तो है इच्छाशक्ति !! ​केवल टेबल पर बैठकर मेन्यू कार्ड पढ़ते रहने व ख्याल पकाते रहने से भूख शांत नहीं होगी, उठकर रसोईघर में जाकर खुद से पकाकर खाने से होगी। ​महान पुरुषों की बात करें तो महात्मा गांधी जी हों या डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, उन्होंने भी विचार किया था राष्ट्र की कायाकल्प को बदलने का और मुमकिन भी किया, क्योंकि उनके पास एक दृढ़ इच्छाशक्ति थी। ​इन सब को समेटने की कोशिश करूँ तो ख्याली पुलाव बस विचार रूपी ईंधन मात्र है; उसे जलाने के लिए इच्छाशक्ति रूपी चिंगारी जलानी होगी, तभी ज्वाला बनकर आग की लपटें उठेंगी। आपका कार्य, आपका लक्ष्य वास्तविकता के धरातल पर उतरेगा। ​अंत में अगर आपका सवाल है कि इच्छाशक्ति आएगी कहाँ से? तो इसका सीधा सा उत्तर है—अपने भीतर से, निरंतरता से, संघर्ष व मेहनत से। जब आप इस चक्र को एक बार पूर्ण करते हैं तो Next time आपको भीतर स्वयं ये शक्ति अनुभव होगी। इस तरह इसको प्राप्त करना या विकसित करना आपके ऊपर निर्भर करता है। जब आप स्वयं से लड़ते हैं, सही मेहनत को चुनते हैं तो यह शक्ति आपके व्यक्तित्व का हिस्सा होगी... वरना! वरना! ख्यालों में जीओ, ख्यालों में खाओ और ख्यालों में ही मस्त रहो! Choice आपकी अपनी है।
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