Creative · Prose5/2/2026

✨️चिंतन एवं चिंता पर विमर्श✨️

by Anil Sharma

💡चिंतन एवं चिंता पर विमर्श✒️ ​चिंतन एवं चिंता, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अर्थात् दोनों ही मानसिक कसरत से जुड़ी हैं, दोनों में विचारों का पुट है, इन समानता के बावजूद भी यह एक-दूसरे के विपरीतता एवं विभिन्नता को दृश्यमान करते हैं। अगर सामान्य अंतरों को देखें तो चिंता आपको उथला एवं खोखला बनाती है, वहीं चिंतन गहरा एवं भरा हुआ। ​मेरा इस विषय पर आकर बोलने का प्रयोजन कोई नैतिकता एवं रटी रटाई धारणाओं से परिचय कराना मात्र नहीं है- कि चिंता मुख्य चिता अथवा अग्नि है जो आपको भीतर से जला देगी, यह बस नैतिकता पूर्ण हवा-बाजी का रूप है। असल में अगर इन दोनों को धरातल पर रखते हुए तार्किक एवं विश्लेषित बुद्धि एवं प्रज्ञा से समझे तो काफी कुछ समझ पाएंगे। ​वैसे अब चिंता से शुरूआत करते हैं, चिंता क्या है?, क्यों है?, किस रूप में है?, कैसा प्रभाव है?...?! ​इन सब का जवाब देने का प्रयास करते हैं, चिंता क्या है? चिंता कोई बाह्य भौतिक वस्तु नहीं है लेकिन भौतिकता से विछिन्न (अलग) भी नहीं है, हां यह भौतिक नहीं किंतु भौतिकता के कारण अवश्य है। यह वास्तव में चिंतन का ही एक सूक्ष्म रूप या परिवर्तित अंश मात्र है, जहाँ चिंतन विचारों की गहरी यात्रा है (शायद भावनाएं भी शामिल हों)। वहीं चिंता विचारों की सतही भाविक अभिव्यक्ति है, इसमें भावनाएं विचारों पर भारी हो जाती हैं और उसे बारम्बार उसी विचार (भौतिक विषय) पर सोचने को मजबूर कर देती हैं। ​चिंतन में जहाँ हम स्वैच्छिक बाह्य दुनिया से कट जाते हैं, विचारों की दुनिया में आनंद के साथ विचरण करते हैं, वहीं चिंता के दौरान भी हमारा मन या विचार आस-पास (बाह्य जगत) में जो चल रहा है उसे भूल जाते हैं स्वेच्छा से नहीं अपितु भावनाओं के बलवती रूप के आगोश में आकर। ​असल में इस परिप्रेक्ष्य से चिंता के अनैतिक या नकारात्मक होने की आलोचनाएँ, अंतिम सत्य नहीं हैं, क्योंकि चाहे चिंतन के स्वैच्छिक रूप में बाह्य जगत से कटाव हो या चिंता के समय किसी कारक द्वारा बाह्य कटाव हो, दोनों का परिणाम तो समान ही हुआ, हाँ प्रभाव की दृष्टि से भिन्नता अवश्य मौजूद है, किंतु केवल प्रभाव या output के आधार पर चिंता को नकारात्मक एवं चिंतन को सकारात्मकता का चोगा क्यों पहनायें। ​चिंता को अनैतिक या नकारात्मक कहने का वास्तव में कोई तर्क मौजूद ही नहीं। वास्तव में तो चिंता, मानव के उद्विकास के साथ प्राप्त हुई एक स्वाभाविक लक्षण है, जो उसे हर समय या हर परिस्थिति में एक जैसा रहने से रोकती है, उसे automation से active & situation Reactor बनाती है। केवल चिंतन का Mechanism ही रहता, चिंता का नहीं तो मानव survival कैसे संभव हो पाता। अगर मानव को अगले दिन या संभवतः रात्रि के भोजन का कोई ख्याल नहीं रहता तो क्या उस दिन उसके कबीले या, परिवार या स्वयं अपनी भूख को केवल चिंतन मात्र से शांत कर पाता? नहीं!, बिल्कुल नहीं! इस प्रकार चिंता कोई अनैतिक या नकारात्मक श्रेणी में रखा जाने वाला तत्व नहीं है यह मानव विकास के दौरान प्राप्त हुई स्वाभाविक गुण (लक्षण) मात्र है। ​अब बात उन महानुभावों के समूह की जो नैतिकता, आदर्शवादी के आवेश में चिंता को तामसिक या अनैतिक प्रवृत्ति का हिस्सा मानकर चिंता को चिता (अग्नि) का रूपक मान लेते हैं। मैं उनकी बात से थोड़ा तो सहमत हूँ, पूर्णतः नहीं, चिंता - चिता तब बन सकती है जब चिंता को हम स्वयं पर अधिभारित (overload) या ज्यादा ही समय दे देते हैं, जो सत्य भी है, जीवन में कोई भी कार्य हो अगर सीमा से ऊपर उठ जाये तो अधिभारित का लाल signal तो आयेगा ही, चाहे चिंता हो या चिंतन !! ​अब बात आ जाती है चिंता को कैसे रोकें, इससे कैसे बाहर निकलें ?, यह प्रश्न असंगत प्रतीत होता है, क्योंकि चिंता स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति, वो ना तो आन्तरिक दबाव से रुकेगी न ही बाह्य साधु-वचन सुनकर। इस विषय में आप यह अवश्य कर सकते हैं कि चिंता को पहले तो तामसिक, नकारात्मक, अनैतिकता के बादलों से ऊपर उठा लें, इसे बस स्वाभाविक लक्षण मात्र मानें। अब अगला चरण, चिंता, आंतरिक नहीं बाह्य विचारों एवं क्रियाकलापों से पैदा होकर मन में जगह पाकर उसका विचार विमर्श एवं मंथन शुरू कर देती है, यह उचित भी है। लेकिन जब एक समय बाद सीमा से ऊपर उठने लगे तो आप स्वयं इसे स्थिर करेंगे, बस मैं केवल छोटी सी hint (चिह्न) बता सकता हूँ - चिंता एवं चिंतन का संबंध विचारों से आप बस उसे ही देखें, समझें एवं प्रयास करें।
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