Creative · Prose5/31/2026
📜 देखो उधर ! संवेदना उड़ रही🐦...
by Anil Sharma
📜 देखो उधर ! संवेदना उड़ रही🐦...
आज सुबह जब फोन ऑन किया और वॉट्सएप पर एक सज्जन का स्टेटस देखा — कुछ रोने की प्रतिछवियाँ (इमोजी) और आगे लिखा था 'पापा !!' एक वक्त के लिए तो उनके प्रति सहानुभूति एवं दया की तीव्र भावनाएँ उत्कंठित हुईं, किंतु अगले ही पल इस भारतीय समाज की नादानियत पर नजर दौड़ी.... पाश्चात्य की चकाचौंध भरी सड़क को निहारना तो ठीक था, पर अब तो भारतीय समाज की सांस्कृतिक जड़े एवं प्रतिबिंबित टमटम, घोड़ा, हाथी, सिंह सब के सब उसी पर दौड़ने लगे।
कहाँ गये हमारे धरोहर के सतरंगी बिंबो के बादल,
जो बरसाते थे — दया, संवेदना एवं नैतिकता !
क्या हम इस भौतिकवादी दुनिया के नये औजारों — इंटरनेट, सोशल मीडिया, फेसबुक, ट्विटर में इतने तलीन हो गए, कि हम स्वयं को ही भूल बैठे...? क्या हमारे लिए खुशी और प्रसन्नता केवल इंटरनेट पर मुबारकों एवं शुभकामनाओं के प्रतिमानों तक ही सीमित हो गई...?
क्या किसी का खुद से बिछड़ना अथवा उनका देहवासन (निधन) केवल उसी पल स्टेटस लगाकर डिजिटल मित्रों से सहानुभूति बटोरने तक सीमित हो गया है...?
क्या रोऊँ क्या गुनगुनाऊँ, मैं उनके लिए,
जिनके अपने ही बेताब थे स्टेटस लगाने के लिए !!
कहाँ जा रहा है भारतीय समाज !
क्या भौतिकता के दीमक ने मानवीयता के वट वृक्ष को खोखला करना शुरू कर दिया है? ना तो उसमें मजबूत भावनाओं का तना बचा है, न ही मुलायम संवेदनाओं की पत्तियाँ।
त्रेता में तो भगवान (राम) भी रोए थे भाई की मूर्च्छा को देखकर, द्वापर में घनश्याम ने भी धोए थे अपने नेत्रों के अश्रु जल से सुदामा के पाँवों की धूल को! तो फिर कलि का क्या ऐसा चक्र... जिसमें न तो मानव के पास धैर्य धारण की शक्ति बची है न ही दो दिन का मौन? क्या नहीं पता आपको, थे आपके वो कौन...?
वो थे जिन्होंने आपको पाला था, पोषा था, बनाया नवाब! बचपन में नंगे पाँव गर्म मिट्टी एवं कंकड़ियों में चलते देख, उठा लिया करते थे गोदी में, चिपटा लेते थे सीने से आपको रोते देख। वही थे जिन्होंने हाथ थाम चलना भी सिखाया और गिरने पर 'जांबाज बेटा' बोलकर उठाया भी।
एक मिष्टी और गुड़ में भी वो मिठास नहीं जो उनकी मार में थी। आज वह नहीं हैं, तो भीड़ का सैलाब भी खाली-खाली सा लगता है, जो देने आया है उन्हें श्रद्धा की अंजलि।
क्यों नहीं मानता आपका दिल यह सच?
अब भी उनके होने का ऐसा एहसास है...
कि आएंगे उस भीड़ को चीरते हुए, मेरे हीय के पास !!
यही है वास्तविक संवेदना का आवेग, जो भावनाओं को साथ लाकर करता है नेत्रों से अनंत वर्षा !!
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