Creative · Prose6/24/2026
🐒 यादों के गलियारे में गलता जी ! 🛕
by Anil Sharma
एक शांत रात, एक सिनेमाई दृश्य और गलता जी के उस ऐतिहासिक मंदिर व अनजान पगडंडी का वो सफर जो अचानक स्मृतियों में जीवंत हो उठा...
23 June, 2026
रात्रि की गोद में समाया मेरा मकान! ऊपर चमक रहा शशि मानो बिखेर रहा है धवल दूध की अजस्र धारा। हवा रुक-रुककर ऐसी चलती मानो हिलोरे देती...!
इतने में ही एक बच्चे के रोने की ध्वनि चारों ओर गूँज उठी, ऊँ... ऊँ... ऊँ...! शायद हमारे ही पड़ोस का लड़का टिल्लू होगा।
मैं कमरे के भीतर आ गया और फिर से सिनेमा देखना शुरू कर दिया—भूत बंगला!! शुरू में डरावनी कम, कॉमेडी ज्यादा लग रही थी, क्योंकि बॉलीवुड की तीन तिकड़ी की जोड़ी—अक्षय, परेश, राजपाल एक साथ मिल गई! मूवी धीरे-धीरे काफी रोमांचक होती जा रही थी। शादी की शहनाइयों के बीच कहानी ने अचानक एक नया मोड़ लिया, जब पिता के एक फोन कॉल ने नायक के कदमों को एक रहस्यमयी मंदिर की ओर मोड़ दिया।
मंदिर काफी भव्य एवं सुंदर शैलकृतियों का बेजोड़ नमूना था। एक क्षण के लिए मुझे ऐसा लगा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। कहाँ देखा? कहाँ देखो!... इस एक दृश्य ने मेरी यादों को तुरंत ही वीणा की तारों की तरह झंकृत कर दिया, और फिर क्या, उसमें से सुर निकलने लगे। चलो सुनते हैं उन सुरों को!
पट-पट करते हमारे तीन दोस्तों के पैरों की ध्वनि कान में आज भी सुनाई दे रही है। पहले एक मील लम्बी चढ़ाई, फिर दो मील लम्बी ढलान। हम युवापन के जोश में कभी दौड़ते, कभी भागते चले जा रहे थे। हर मोड़ पर रास्तों के छोटे-छोटे गलते तो दिखाई दे रहे थे, पर गलता जी नहीं।
नीचे पहुँचे तो सामने दिखी एक बंदरों की फौज। कुछ हरी काई से मटियामैले तालाब में पानी पी रहे थे, कुछ मंदिर के छज्जों पर लटके थे, कुछ आने-जाने वाले गलियारों में खड़े थे; मानो अपनी इस दुनिया से अलग, इस अनोखे शहर का पहरा दे रहे हों...! तभी एक बंदर ने टोपी उठा ली एक अंग्रेज अफसर की। वो अंग्रेजी में बड़बड़ा रहा है, पर बंदर क्या जाने, वो तो उछल-कूद कर रहा!
हम गलियारों से भीतर की ओर बढ़े। उन बंदरों की सेना से छिपते-छिपाते भीतर का दृश्य पर्वतों की गोद में समाया था। 'गलता कुंड', पानी काफी स्वच्छ और ठंडा था। कुछ श्रद्धालु डुबकी लगा रहे थे, कुछ दूर से ही हाथ-पैर धोकर जा रहे थे। कुछ किशोर-युवक निःशुल्क प्राकृतिक स्विमिंग पूल जैसा मजा ले रहे थे, मानो महीने भर जमे मैल को यहीं अर्पित करके शुद्ध हो जाएँगे। प्रकृति प्रदत्त शुद्ध जल का छोटा सा कुंड, यहाँ के जीव-जंतुओं, बंदरों की प्यास बुझाने के लिए शायद पर्याप्त नहीं है, जब तक हम इंसानों की इच्छाओं की मलिनता पूरी तरह धुल न जाए!
हम आगे बढ़े, एक गोशाला थी। गायें, बछड़े, कुछ बैल एक ही बाड़े में चहारदीवारी के अंदर कैद थे। वैसे उत्तर-वैदिक काल के 'गोत्र' का मतलब गोशाला से ही था, यानी वह स्थान जहाँ पूरे कबीले के पशु रखे जाते थे, लेकिन समय के साथ यह एक ही पूर्वज के वंश का सूचक हो गया। एक बैल तो बाहर ही घूम रहा था, हम चुपके से आगे निकल गए।
कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि पत्थरों पर उकेरी गई आस्था ऐतिहासिक मंदिरों के रूप में आकार लेने लगी। शायद भक्तिकाल के राममार्गी संत कृष्णदास पयहारी ने ही यहाँ एक पीठ की स्थापना की, जो आज गलता धाम बन गया है। चंदन के तिलक में रंगे मंदिर मानो तुलसीदास का ललाट, जिसे स्वयं राम जी ने लगाया हो। मंदिर शैली काफी अनोखी एवं अद्भुत लग रही थी। मंदिरों की सीढ़ियाँ, प्रांगण, चंदनिया-पीला रंग, पहाड़ों की ओट में बसा,यह सब कुछ दृश्य एक बार के लिए किसी को नयनाभिराम लग सकता है, मानो हम मथुरा-बरसाना में खड़े स्वयं कोई कृष्ण लीला देख रहे हों।
भीतर के प्रांगण में प्रवेश करते ही शीतलता महसूस हुई। भीतर बाईं तरफ तो गुरु-शिष्यों का संस्कृत मंत्रोच्चारण चल रहा था। हमने गलता जी के दर्शन किए और उल्टे पाँव मंदिर से बाहर आ गए। उल्टे पाँव इसलिए क्योंकि देवता को पीठ नहीं दिखाते। आगे के छोटे-छोटे मंदिरों में भी दर्शन कर आए।
गलियारे से निकलते वक्त बंदर-सेना से एक बार तो मैं भबका (डरा), फिर झट से बाहर आ गया। उनकी लाल आँखें, सफेद दाँत, हमें खुशी से ज्यादा भयभीत कर रहे थे, कहीं मेरे ऊपर झपट ना पड़ें। वैसे सफेद दाँतों से याद आया, शायद यह लोग हमारी तरह तम्बाकू, पान-मसाला नहीं खाते, इसलिए बत्तीसी दिखा रहे हैं। शायद मूक वाचन हो—यह गलियारे और परिसर की दीवारें हमने लाल नहीं कीं, यह आपका ही पान-मसाले का कल्याण है, जहाँ कहीं जाते हो रंग-रोगन कर ही देते हो, वरना कहीं यह भी हमसे अछूता न रह जाए।
गलियारे से निकले कि आगे फिर वही ढाल अब चढ़ाई बन गई। चप्पल हाथों में लिये हुए छोटी-छोटी दौड़ से ऊपर चढ़ रहे थे। बीच में एक छोटा सा हनुमान मंदिर था, केसरिया तिलक से पुता हुआ, अंदर पंडित जी दिया जला रहे थे। हमने भी पीछे से जयकारा लगा दिया—बजरंग बली की जय हो!....
आते हुए तो काफी जोश था, शायद कुछ नया देखने की उत्सुकता, किंतु जाते वक्त वही अब थकान और चढ़ाई की चिंता में तब्दील हो गई। बीच में एक छोटी पगडंडी भी दिखी, जो आगे जंगल और झाड़ियों की तरफ जा रही थी। हमने उत्सुकता से उस ओर कूच किया, किंतु शाम के आगोश में उल्टे पाँव वापस पीछे मुड़ गए। करते-करते हमने ढलान को पार किया, मानो हमने माउंट फतह कर लिया हो। इसी आशा के साथ बचा हुआ रास्ता भी पैरों से नाप लिया।
शायद कुछ पल हमेशा के लिए ठहर जाना चाहते हैं, पर चलने का नाम जीवन है..!
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